पहाड़ों पर जमी ये बर्फ जैसे, गल रही है. उम्र वैसे ही उसके इंतज़ार में, ढल रही है। दिए थे मां ने पल्लू से बंधे जो चंद सिक्के, गुज़रगम्मत उन्ही सिक्कों पे अब तक, चल रही है। मोहब्बत करने का तब होता है दुगना मज़ा जब हमको पता हो यारों की हमसे, जल रही है । वजह बतला दो मेरे, घर क्यों आईं शाम को, गलतफहमी हमारे दिल में भारी, पल रही है। सभी कुछ पास था मैं और कुछ क्या मांगता, वो मेरे सामने बैठी है, बातें चल रही हैं। उधर गुलमर्ग में सर्दी में देखे हसीं जोड़े, इधर भोपाल में इतनी कमी क्यों, खल रही है।
तेरा तुझमें क्या है? जन्म दिया तुझे मात-पिता ने जीवन परमपिता ने और नाम दिया है बुआ ने तेरा तुझमें क्या है? आँखें खोली, देखी ये धरा अपने होने पे मान करा प्रकृति,पंछी,सब जीवों से निज स्वार्थ हेतु इंसान लड़ा विष घुलित किया धरती नभ को जैसे काट लिया हो बिछुआ ने तेरा तुझमें क्या है? इंसान की हस्ती है छोटी दे दें तृप्ति, चार रोटी फिर क्यों भू-पेट चीर देतीं दोहन करती ये मशीनें मोटी गर्त की ओर खींच लिया हमें अंधी हवसों के कुआं ने तेरा तुझमें क्या है? -शिवाजी
यह पुण्य भूमि मां भारती पुत्रों को रही पुकारती लहू पाखंडी का पीने को दु:शासन के फिर सीने को चीरने का जो प्रण ले पाए भीमसेन से नगीने को कर्तव्य हेतु ललकारती। पुत्रों को रही पुकारती। माना शत्रु है विकट धूर्त राक्षस वध का तय है मुहूर्त आतंकी हाहाकार करें तांडव को दो अब रूप मूर्त गूंजे नभ में जय आरती पुत्रों को रही पुकारती। माना शांति का नहीं विकल्प किंतु शत्रु के कार्य कल्प सहन सीमा से जो गुजर जाए तो भैरव बन लो कृत संकल्प बसुधा वीरों को बारती पुत्रों को रही पुकारती। यह पुण्य भूमि मां भारती पुत्रों को रही पुकारती।। -शिव
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