पहाड़ों पर जमी ये बर्फ जैसे, गल रही है. उम्र वैसे ही उसके इंतज़ार में, ढल रही है। दिए थे मां ने पल्लू से बंधे जो चंद सिक्के, गुज़रगम्मत उन्ही सिक्कों पे अब तक, चल रही है। मोहब्बत करने का तब होता है दुगना मज़ा जब हमको पता हो यारों की हमसे, जल रही है । वजह बतला दो मेरे, घर क्यों आईं शाम को, गलतफहमी हमारे दिल में भारी, पल रही है। सभी कुछ पास था मैं और कुछ क्या मांगता, वो मेरे सामने बैठी है, बातें चल रही हैं। उधर गुलमर्ग में सर्दी में देखे हसीं जोड़े, इधर भोपाल में इतनी कमी क्यों, खल रही है।
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