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ग़ज़ल

पहाड़ों पर जमी ये बर्फ जैसे, गल रही है. उम्र वैसे ही उसके इंतज़ार में, ढल रही है। दिए थे मां ने पल्लू से बंधे जो चंद सिक्के, गुज़रगम्मत उन्ही सिक्कों पे अब तक, चल रही है। मोहब्बत करने का तब होता है दुगना मज़ा जब हमको पता हो यारों की हमसे, जल रही है । वजह बतला दो मेरे, घर क्यों आईं शाम को, गलतफहमी हमारे दिल में भारी, पल रही है। सभी कुछ पास था मैं और कुछ क्या मांगता, वो मेरे सामने बैठी है, बातें चल रही हैं। उधर गुलमर्ग में सर्दी में देखे हसीं जोड़े, इधर भोपाल में इतनी कमी क्यों, खल रही है। 

हिल्सटेशन

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ग़ज़ल:- कुछ सवाल

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मां भारती

यह पुण्य भूमि मां भारती पुत्रों को रही पुकारती लहू पाखंडी का पीने को दु:शासन के फिर सीने को चीरने का जो प्रण ले पाए भीमसेन से नगीने को कर्तव्य हेतु ललकारती। पुत्रों को रही पुकारती। माना शत्रु है विकट धूर्त राक्षस वध का तय है मुहूर्त आतंकी हाहाकार करें तांडव को दो अब रूप मूर्त गूंजे नभ में जय आरती पुत्रों को रही पुकारती। माना शांति का नहीं विकल्प किंतु शत्रु के कार्य कल्प सहन सीमा से जो गुजर जाए तो भैरव बन लो कृत संकल्प बसुधा वीरों को बारती पुत्रों को रही पुकारती। यह पुण्य भूमि मां भारती पुत्रों को रही पुकारती।। -शिव

राजस्थान का सफर

आ रहे हैं हम, फिर मिलेंगे इत्मीनान से  साथ आ रहे कुछ दोस्त, कुछ होंगे नए अनजान से । आकर के इस देश में, खो जाएंगे यही  हो जाएंगे रजपूतों से, ना रहेंगे मेहमान से । वीरों की इस बस्ती की, मस्ती भी है गजब  कुछ अजब मिलेगा यहां, रह जाओगे हैरान से ।  हम प्यार के पंछी, ओ ये गोरियों का गांव  टुकटक निहारते इन्हें, हम दिल-ए-नादान से । 'शिव' चाहता है दो घड़ी, जीवन में वो सुकूँ आब-ए-हयात की चाह में, फिरते हैं परेशान से । © शिवजी राय 'शिव'

वो बेवफा

लंबा रस्ता, ये पल दो पल की बात नहीं है । चलते जाना, ये चंद कदम का साथ नहीं है । जी आप हमें अब माफ करो मेहरबानी करके , ये प्यार मोहब्बत आप के बस की बात नहीं है । हम भोले थे चिकनी बातों में बहक गए , मैं चाहूं उसे उसकी इतनी औकात नहीं है । मेरी गलती थी उस जैसी पर लुटा गया , मिरा प्यार कोई दो कौड़ी की खैरात नहीं है। वो लौट भी आएगी तो कोई फर्क नहीं अब अब 'शिव' के दिल में उसके लिए जज़्बात नहीं है। -shivaji Rai 'shiv' 17-10-18

बातें

जीवन के अनुभव बातों में, बातें ही अनुभव होती हैं कुछ बातें शिक्षक होती हैं उनमें शिक्षाएं होती है। मैं भाल मान का भार लिए निज कांधों पर सब सह आया जब था सोया चुपचाप रहा जागा तो वो सब कह आया जो बात कहने में साँसे ही चाटुकारों की थमती हैं । कुछ बातें कहनी होती हैं। बेशक, कहनी ही होती हैं। तुम स्वर्ण दीप्ति से पुलकित हो मैं तपिस, घाम सब सहता हूँ तुम सत्ता गलियारों सी शोभित मैं बिद्रोही स्वर कहता हूँ । इतिहास सदा है साक्ष्य रहा ऐसी यारी न होती है जब होती है सब खोती है। हम साथ चले दो प्रेम पथिक एक दोराहे तक पहुच गये तुमने आडंबर मार्ग चुना हम प्रीत गली की ओऱ मुड़े अब दूरी बढ़ती जानी है राहें आगे न मिलती हैं बिपरीत ध्रुवो पर चलती हैं। - शिवा ( 31मई 18 )